कभी टीवी देखकर सीखा डांस, आज कोटद्वार के बच्चों और महिलाओं के लिए बना रहीं मंच – जानिए शिल्पा की कहानी

दिनांक : 2026-09-05 16:28:00

कोटद्वार (शीतल बहुखंडी): दो विद्यार्थियों से शुरू हुआ एक छोटा-सा सफर आज बच्चों, युवाओं और महिलाओं को नृत्य के माध्यम से आत्मविश्वास, अभिव्यक्ति और अपनी पहचान बनाने का अवसर दे रहा है। 7 सितंबर 2026 को कोटद्वार का ‘नृत्य स्टूडियो’ दो वर्ष पूरे कर रहा है—और यह अवसर उसकी संस्थापक शिल्पा की उस यात्रा को जानने का है, जिसमें उन्होंने सुरक्षित करियर विकल्प के बजाय अपने जुनून को चुना।

 

किसी बच्ची से पूछा जाए कि वह बड़ी होकर क्या बनना चाहती है, तो उत्तर अक्सर डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक या अधिकारी बनने का होता है। कला, और खासकर नृत्य को लेकर समाज की सोच अब भी पूरी तरह नहीं बदली है। कई घरों में डांस को खुशी, उत्सव और मनोरंजन का माध्यम तो माना जाता है, लेकिन उसे भविष्य या करियर के रूप में अपनाने को लेकर संकोच बना रहता है।

ऐसे माहौल में किसी युवती का पढ़ाई के बाद सुरक्षित रास्ता चुनने के बजाय अपने जुनून को जीवन का रास्ता बनाना आसान निर्णय नहीं होता। शिल्पा की कहानी उसी साहस, संघर्ष, धैर्य और विश्वास की कहानी है।

जिस नृत्य को उन्होंने बचपन में केवल अपनी खुशी के लिए शुरू किया था, वही धीरे-धीरे उनकी पहचान बन गया। आज वही पहचान कोटद्वार में ‘नृत्य स्टूडियो’ के रूप में बच्चों, युवाओं और महिलाओं को नृत्य सीखने के साथ-साथ मंच पर आने, खुद को अभिव्यक्त करने और आत्मविश्वास से आगे बढ़ने का अवसर दे रही है।

 

बचपन का शौक कब पहचान बन गया

 

 

 

शिल्पा कहती हैं कि उन्होंने बचपन से ही नृत्य किया, लेकिन तब उन्हें नहीं लगा था कि एक दिन यही कला उनकी पहचान बन जाएगी। उनके लिए डांस का अर्थ था खुशी—घर में, स्कूल में या कॉलेज में, जहां अवसर मिला, वह नृत्य करती रहीं।

लेकिन जिस सामाजिक वातावरण में वह पली-बढ़ीं, वहां नृत्य को करियर के रूप में अपनाने की कोई मिसाल सामने नहीं थी। परिवार और आसपास के लोग पढ़ाई को ही सुरक्षित भविष्य का रास्ता मानते थे, जबकि डांस को मनोरंजन भर समझा जाता था।

आज इंटरनेट और सोशल मीडिया के माध्यम से हजारों डांस वीडियो, ऑनलाइन क्लास और कलाकारों तक पहुंच आसान है, लेकिन शिल्पा के शुरुआती दिनों में ऐसा नहीं था। उनके लिए टेलीविजन ही पहली सीख का माध्यम था। *डांस इंडिया डांस* जैसे कार्यक्रमों ने उन्हें यह समझने में मदद की कि नृत्य केवल मनोरंजन नहीं है; यह एक कलाकार की पहचान और करियर भी हो सकता है।

इसी दौर में उनके मन में एक सपना आकार लेने लगा—यदि उन्हें सीखने के लिए पर्याप्त अवसर नहीं मिले, तो वह भविष्य में ऐसा मंच जरूर बनाएंगी जहां उनके जैसे बच्चों को अवसर की कमी महसूस न हो।

 

 12वीं के बाद शुरू हुई गंभीर तैयारी

बचपन से नृत्य करने वाली शिल्पा ने औपचारिक प्रशिक्षण 12वीं के बाद शुरू किया। कुछ प्रशिक्षण ऐसे भी रहे जिनकी जानकारी परिवार को नहीं थी। कहीं फीस अधिक थी, कहीं सही मार्गदर्शन सीमित था, लेकिन उनके मन में एक ही बात थी—

 

> “नृत्य को एक मौका तो देना है।”

 

पढ़ाई और नृत्य दोनों साथ चलते रहे। धीरे-धीरे 21 वर्ष की उम्र तक आते-आते डांस उनके लिए सिर्फ एक शौक या गतिविधि नहीं रहा। वह इस कला के प्रति पूरी तरह समर्पित हो चुकी थीं।

आज जब वह पीछे मुड़कर देखती हैं, तो मानती हैं कि यदि शुरुआत में परिवार और समाज का पूरा समर्थन मिल गया होता, तो शायद उनका स्टूडियो आज दो साल का नहीं, बल्कि चार या पांच साल पुराना होता। लेकिन संघर्ष ने ही उन्हें वह समझ दी, जिसके आधार पर वह अब दूसरे बच्चों और महिलाओं के लिए अवसर तैयार कर रही हैं।

 

 असली लड़ाई नृत्य की नहीं, सोच की थी

 

 

 

शिल्पा एक प्रतिभाशाली विद्यार्थी थीं। ऐसे में नृत्य को करियर के रूप में चुनना उनके लिए और भी कठिन फैसला था। सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं थी कि उन्हें डांस सीखना है; चुनौती थी परिवार और समाज को यह समझाना कि उनका निर्णय गलत नहीं है।

उनके माता-पिता हमेशा उनके साथ रहे, लेकिन नृत्य को पेशे के रूप में स्वीकार करना उनके लिए भी आसान नहीं था। उनकी चिंता स्वाभाविक थी। उन्होंने अपने आसपास इस क्षेत्र में किसी को सफल होते नहीं देखा था।

शिल्पा इस चिंता को समझती थीं। वह जानती थीं कि कई बार परिवार का विरोध सपनों को रोकने की इच्छा नहीं होता, बल्कि अपने बच्चे के भविष्य की चिंता होती है। इसलिए उन्होंने बहस या टकराव का रास्ता नहीं चुना। उन्होंने खुद को साबित करने का रास्ता चुना।

उनका मानना था कि उन्हें बाहर वालों को जवाब नहीं देना है। उन्हें सबसे पहले अपने माता-पिता को यह विश्वास दिलाना था कि वह अलग सोचती हैं, लेकिन गलत नहीं सोचतीं।

 “मुझे सिर्फ दो साल दे दीजिए”

शिल्पा के जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ वह था जब उन्होंने परिवार से कहा कि उन्हें नृत्य के लिए दो साल दिए जाएं। उन्होंने कहा कि वह पूरी शिद्दत से दो साल नृत्य को देना चाहती हैं। यदि वह सफल नहीं हुईं, तो डांस छोड़कर बैंकिंग की तैयारी करेंगी।

कॉमर्स की अच्छी विद्यार्थी होने के कारण बैंकिंग उनके लिए एक सुरक्षित और स्वाभाविक करियर विकल्प था। लेकिन वह अपने जीवन में यह पछतावा नहीं चाहती थीं कि—

 

> “काश मैंने उस समय अपने सपने को एक मौका दिया होता, तो शायद आज मैं कहीं और और ज्यादा खुश होती।”

परिवार ने उनकी बात सुनी। यहीं से उनकी मां का साथ और भी महत्वपूर्ण हो गया।

 

“हो जाएगा, चल करते रह…”

 

शिल्पा अपनी मां को अपनी सफलता की सबसे बड़ी प्रेरणाओं में गिनती हैं। उनकी मां ने बचपन से उन्हें और उनकी बहन को आत्मनिर्भर बनने की सीख दी। उनका मानना था कि बेटियों को पहले अपने पैरों पर खड़ा होना चाहिए और अपनी पहचान बनानी चाहिए।

जब आसपास से सवाल उठ रहे थे, जब लोग नृत्य को करियर मानने पर संदेह जता रहे थे, तब मां का एक छोटा-सा वाक्य शिल्पा के लिए बड़ी ताकत बन गया—

 

> “हो जाएगा, चल करते रह।”

 

एक बेटी के सपने में परिवार का भरोसा उसके आत्मविश्वास को कई गुना बढ़ा सकता है। शिल्पा की यात्रा भी यही बताती है कि समर्थन केवल शब्द नहीं होता; कई बार एक व्यक्ति का विश्वास किसी को अपने डर से आगे निकलने की ताकत देता है।

लेकिन इस भरोसे के साथ शिल्पा ने जिम्मेदारी भी उठाई। वह जानती थीं कि अब उन्हें अपने निर्णय को परिणाम में बदलना होगा।

 

दो विद्यार्थियों से शुरू हुआ स्टूडियो

 


 

2024 में जब शिल्पा ने अपना स्टूडियो खोलने का निर्णय लिया, तो मन में उत्साह के साथ कई सवाल थे।

क्या लोग उन पर भरोसा करेंगे?  

क्या किराए की जगह का खर्च निकल पाएगा?  

क्या शुरुआत छोटी जगह से करनी चाहिए?  

क्या वह बच्चों को संभाल पाएंगी?  

क्या वह एक अच्छी शिक्षक साबित होंगी?  

और यदि असफल हो गईं तो क्या दोबारा खड़ी हो पाएंगी?

 

इन सभी सवालों के बावजूद उन्होंने शुरुआत की।

स्टूडियो का पहला दिन सोमवार था। उन्हें उम्मीद नहीं थी कि पहले दिन कोई विद्यार्थी आएगा। लेकिन उसी दिन दिया नाम की एक छात्रा उनके पास पहुंची। दिया लंबे समय से उनसे डांस क्लास शुरू करने का आग्रह कर रही थी। वह ‘नृत्य स्टूडियो’ की पहली छात्रा बनी।

 

आज वही दिया स्टूडियो के एक बैच को इंस्ट्रक्टर के रूप में संभाल रही हैं। यह केवल एक छात्रा की प्रगति नहीं है; यह उस भरोसे की कहानी है जो एक शिक्षक और विद्यार्थी के बीच समय के साथ बनता है।

पहले महीने में विद्यार्थियों की संख्या दो से चार के बीच रही। शुरुआती तीन महीने आसान नहीं थे, लेकिन शिल्पा की एक आदत उनके साथ रही—पूरी कोशिश किए बिना हार न मानना।

 

दो साल की सफलता नहीं, पांच साल की मेहनत

शिल्पा अपने स्टूडियो की सफलता को केवल पिछले दो वर्षों से नहीं जोड़तीं। उनके अनुसार यह पांच वर्ष के अनुभव, अभ्यास और लगातार संघर्ष का परिणाम है।

जब कोई उन्हें नहीं जानता था, जब किसी को नहीं पता था कि वह भविष्य में अपना स्टूडियो खोलेंगी, तब भी वह अपनी कला के साथ लगातार काम कर रही थीं। वह सीख रही थीं, अभ्यास कर रही थीं और अपने भीतर उस दिन की तैयारी कर रही थीं जब उन्हें अपना मंच बनाना होगा।

यह बात उन युवाओं के लिए भी महत्वपूर्ण है जो किसी काम की शुरुआत के तुरंत बाद परिणाम चाहते हैं। सफलता अक्सर उस दिन शुरू नहीं होती जिस दिन कोई व्यवसाय, स्टूडियो या संस्था शुरू होती है। उसकी नींव उससे वर्षों पहले पड़ चुकी होती है।

 

यहां नृत्य के साथ आत्मविश्वास भी सीखा जाता है

 

नृत्य स्टूडियो में सबसे छोटा विद्यार्थी करीब 3 वर्ष का है, जबकि सबसे बड़ी शिक्षार्थी की उम्र करीब 55 वर्ष है। शिल्पा का मानना है—

 

> “सीखने की कोई उम्र नहीं होती।”

 

इसी सोच के साथ उन्होंने महिलाओं के लिए अलग बैच भी शुरू किया। उनके अनुसार स्टूडियो आने वाले हर व्यक्ति की वजह अलग होती है। कोई नृत्य में आगे बढ़ना चाहता है, कोई स्टेज पर परफॉर्म करना चाहता है, कोई अपने शरीर को सक्रिय रखना चाहता है और कोई केवल खुशी के लिए यहां आता है।

शिल्पा के लिए हर कारण उतना ही महत्वपूर्ण है।

स्टूडियो में केवल डांस स्टेप्स सिखाने पर जोर नहीं दिया जाता। नृत्य की बुनियाद, बॉडी मूवमेंट, फाउंडेशन, एक्सरसाइज और जिम्नास्टिक के कुछ बेसिक एलिमेंट्स पर भी काम किया जाता है। उनका मानना है कि नृत्य केवल शरीर की गतिविधि नहीं है। उसे समझना, सुनना, महसूस करना और उसकी तकनीक को सीखना भी जरूरी है।

 

 जब स्टेज का डर खत्म हो जाए

 

 

 

किसी डांस स्टूडियो की सफलता केवल विद्यार्थियों की संख्या या प्रतियोगिताओं में मिली ट्रॉफियों से नहीं मापी जा सकती। शिल्पा के लिए असली सफलता तब है, जब कोई बच्चा जो कभी मंच पर जाने से डरता था, आत्मविश्वास के साथ दर्शकों के सामने प्रदर्शन करे।

वह कहती हैं कि यदि कोई विद्यार्थी डांस सीखने के बाद भी मंच पर जाने से डर रहा है, तो शिक्षक को खुद से भी सवाल करना चाहिए।

उनके लिए जीत या हार से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है कि विद्यार्थी मंच पर उतरे, दर्शकों का सामना करे और अपने डर को पीछे छोड़ सके।

 

जब कोई बच्चा प्रदर्शन के बाद पूछता है—

 

> “मैं दोबारा स्टेज पर कब जाऊंगा?”

 

तो शिल्पा के लिए वही सबसे बड़ी सफलता होती है।

 

“मुझे आपके जैसा बनना है”

 

स्टूडियो में दिवाली, होली, शिक्षक दिवस, बाल दिवस, समर कैंप, वर्कशॉप और कई यादगार अवसर आए हैं। लेकिन शिल्पा के लिए सबसे भावुक क्षण वह था, जब एक विद्यार्थी ने उनसे कहा—

 

> “मुझे आपके जैसा बनना है।”

 

एक शिक्षक के लिए इससे बड़ी प्रशंसा शायद ही कोई हो सकती है। शिल्पा के लिए यह केवल एक प्यारा वाक्य नहीं था; यह इस बात का एहसास था कि उनकी मेहनत किसी बच्चे की सोच और सपनों का हिस्सा बन चुकी है।

उनका मानना है कि स्टूडियो केवल डांस सिखाने की जगह नहीं होना चाहिए। यह ऐसा घर होना चाहिए जहां नृत्य से प्रेम करने वाले लोगों को अपनापन महसूस हो।

 

विद्यार्थियों की खुशी ही असली उपलब्धि

 

 

 

शिल्पा अपनी सफलता का श्रेय केवल अपनी मेहनत को नहीं देतीं। वह मानती हैं कि उनके विद्यार्थी इस कहानी का दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण पक्ष हैं।

कई विद्यार्थी उन्हें बताते हैं कि स्टूडियो आने के बाद उनमें आत्मविश्वास बढ़ा, बोलने का तरीका बदला, लोगों से मिलने का नजरिया बदला और उन्होंने अपनी खुशी को व्यक्त करना सीखा।

कुछ विद्यार्थी स्टूडियो को “खुशी का पिटारा” कहते हैं। जब उनका मन उदास हो, जब कहीं मन न लगे, तो वे स्टूडियो चले आते हैं।

शिल्पा के लिए यह किसी ट्रॉफी, प्रमाणपत्र या पुरस्कार से कम नहीं है। उनका मानना है कि जब उनका विद्यार्थी खुश होता है, तो वही खुशी उनकी अपनी खुशी बन जाती है।

 

 नृत्य: 10 प्रतिशत पेशा, 90 प्रतिशत जुनून

शिल्पा के लिए नृत्य को केवल पेशा कहना इस यात्रा को छोटा कर देना होगा। वह इसे अपना जुनून, अपना गर्व और अपनी पहचान मानती हैं।

 

उनके शब्दों में—

 

> “यह 10 प्रतिशत पेशा है और 90 प्रतिशत जुनून।”

 

एक शिक्षक बनने के बाद उन्होंने एक और बात महसूस की है—

 

> “आपकी खुशी आपकी खुशी नहीं रहती, दूसरों की खुशी आपकी खुशी बन जाती है।”

 

शायद यही कारण है कि वह अपने विद्यार्थियों की उपलब्धियों में खुद से भी ज्यादा खुश होती हैं।

 

 जब विद्यार्थी चले जाते हैं

 

शिल्पा भावुक स्वभाव की हैं और अपने विद्यार्थियों से जल्दी जुड़ जाती हैं। जब कोई बच्चा लंबे समय तक उनसे सीखने के बाद शहर छोड़ देता है, तो वह उनके लिए कठिन पल होता है।

कई पुराने विद्यार्थी आज भी फोन और संदेश करके बताते हैं कि उन्हें स्टूडियो और अपनी टीचर की याद आती है। कुछ विद्यार्थी ऑनलाइन क्लास की मांग भी करते हैं।

शिल्पा मानती हैं कि बच्चों से जुड़ाव कम करना शायद उनके लिए आसान नहीं होगा। लेकिन उन्होंने खुद को मजबूत करना सीखना शुरू किया है।

उनका भाव है—मोहब्बत करना नहीं छोड़ना है, बस उस मोहब्बत के साथ मजबूत रहना सीखना है।

 

 “मुझे नहीं पता कैसे, लेकिन मुझे करना है”

 

हर संघर्ष की तरह शिल्पा के जीवन में भी ऐसे दौर आए जब उन्हें लगा कि शायद सपना पूरा नहीं होगा। जब आसपास से कहा गया कि नृत्य में समय लगाना व्यर्थ है, जब भविष्य को लेकर सवाल उठे और जब खुद को भी अपने निर्णय पर संदेह हुआ, तब कई बार लगा कि शायद सपना केवल सपना ही रह जाएगा।

लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

फिल्म *3 Idiots* ने भी उन्हें अपने सपनों, करियर और खुशी को अलग नजरिए से देखने की प्रेरणा दी। उनका मानना है कि युवाओं को करियर का निर्णय केवल समाज की अपेक्षाओं के आधार पर नहीं करना चाहिए। उन्हें यह समझना चाहिए कि वे किस काम में अपना पूरा मन, मेहनत और समय लगा सकते हैं।

 

उनकी यात्रा को यदि एक वाक्य में समेटना हो, तो शायद वह यही होगा—

 

> “मुझे नहीं पता कैसे, लेकिन मुझे करना है।”

 

 महिला सशक्तिकरण का अर्थ

शिल्पा की कहानी केवल एक डांस स्टूडियो की कहानी नहीं है। यह उस युवती की कहानी है जिसने अपने लिए एक रास्ता चुना और फिर उस रास्ते की जिम्मेदारी भी उठाई।

महिला सशक्तिकरण केवल नौकरी करने या आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने तक सीमित नहीं है। अपने जीवन का निर्णय लेना, उस निर्णय पर मेहनत करना, उसके परिणाम की जिम्मेदारी लेना और अपनी पहचान स्वयं बनाना भी सशक्तिकरण है।

शिल्पा ने किसी पहले से बने रास्ते को नहीं चुना। उन्होंने अपना रास्ता बनाया। और आज वह उसी रास्ते पर चलने वाले बच्चों, युवाओं और महिलाओं के लिए जगह तैयार कर रही हैं।

 

अब सपना कोटद्वार तक सीमित नहीं

नृत्य स्टूडियो को लेकर शिल्पा के सपने अभी पूरे नहीं हुए हैं। वह भविष्य में इसे दूसरे शहरों तक ले जाना चाहती हैं, ताकि अधिक से अधिक बच्चों और युवाओं को नृत्य से जुड़ने, उसे समझने और उसके माध्यम से आगे बढ़ने का अवसर मिल सके।

वर्कशॉप, कैंप, प्रतियोगिताएं और अलग-अलग शहरों के प्रशिक्षकों को बुलाने की उनकी कोशिश इसी दिशा में है। दिल्ली, मुंबई और पुणे जैसे शहरों के प्रशिक्षकों से विद्यार्थियों को सीखने का अवसर देना उनके उस संकल्प को दिखाता है कि उनके विद्यार्थियों को वही exposure मिले, जिसके लिए कभी उन्हें स्वयं बाहर जाना पड़ा था।

भविष्य में वह अपने जैसे जुनूनी शिक्षकों की टीम बनाना चाहती हैं और उन्हें भी आगे बढ़ने का अवसर देना चाहती हैं।

 

 एक सपना, जो अब सिर्फ शिल्पा का नहीं

 

 

 

7 सितंबर 2026 को नृत्य स्टूडियो के दो वर्ष पूरे होंगे। लेकिन इस सफर की सबसे सुंदर बात यह है कि दो साल पहले शुरू हुआ यह काम अब केवल शिल्पा का निजी सपना नहीं रहा।

इससे जुड़े बच्चे, युवा, महिलाएं, अभिभावक और प्रशिक्षक—सभी इस कहानी का हिस्सा हैं।

कभी शिल्पा को नृत्य सीखने के लिए टेलीविजन का सहारा लेना पड़ता था। आज उनकी कोशिश है कि कोटद्वार या आसपास के किसी बच्चे को अपने सपने के लिए अवसरों की कमी से न गुजरना पड़े।

 

एक समय वह खुद मंच तलाश रही थीं। आज वह दूसरों के लिए मंच तैयार कर रही हैं।

और शायद एक कलाकार या शिक्षक की इससे बड़ी सफलता नहीं हो सकती कि उसकी कला केवल उसकी पहचान न बने, बल्कि किसी दूसरे के आत्मविश्वास, खुशी और सपने की वजह भी बने।

शिल्पा की कहानी यही सिखाती है कि सुरक्षित रास्ता हमेशा सही रास्ता नहीं होता। कई बार अपने भीतर की आवाज सुनकर बनाया गया रास्ता कठिन जरूर होता है, लेकिन वही रास्ता एक दिन आपकी पहचान बन सकता है।

 

शिल्पा के लिए वह पहचान है—**नृत्य**।

 

पेशा शायद 10 प्रतिशत हो, लेकिन जैसा वह खुद कहती हैं—इस सफर में 90 प्रतिशत जुनून है।

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