दिनांक : 2026-10-04 22:39:00
- श्रद्धा सम्मान लोकपितृ स्मरण समारोह में दिवंगत लोक कलाकारों के परिजनों का सम्मान, कोश्यारी बोले – संस्कृति का उद्गम पर्वतों से, लोककला को नई पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी
देहरादून। उत्तराखंड की गढ़वाली, कुमाऊंनी, जौनसारी और नेपाली बोलियों में केवल संवाद नहीं, बल्कि देवत्व और पहाड़ की आत्मा बसती है। हमारी लोक संस्कृति, गीत-संगीत, जागर और परंपराएं प्रकृति और इष्टदेवों से जुड़ी हैं। इन्हें बचाना और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना हम सबकी जिम्मेदारी है। यह बात महाराष्ट्र के पूर्व राज्यपाल एवं उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी ने ‘आवाज सुनो पहाड़ों की’ मंच की ओर से आयोजित श्रद्धा सम्मान लोकपितृ स्मरण समारोह-2026 में कही।
लोक कलाकारों की स्मृति को किया नमन
समारोह के तीसरे दिन कोश्यारी ने लोकपितृ की स्मृति में दीप प्रज्ज्वलित कर दिवंगत लोक कलाकारों को श्रद्धा सुमन अर्पित किए। उन्होंने कहा कि कला ईश्वर की देन है और उत्तराखंड को प्रकृति ने इष्टदेव की जागर, लोकगीत और समृद्ध गीत-संगीत की परंपरा दी है। लोक कलाकारों और साहित्यकारों ने अपनी पूरी जिंदगी पहाड़ की संस्कृति को जीवित रखने में लगा दी। उनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। उन्होंने कहा कि संस्कृति का उद्गम भी पर्वतों से ही हुआ है, जैसे नदियों का उद्गम पर्वतों से होता है। उत्तराखंड भगवान शिव और मां नंदा की भूमि है और यहां के लोग उनकी संतान हैं। इसलिए अपनी लोक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को बचाने की जिम्मेदारी भी हमारी ही है।
दिल्ली में गढ़वाली-कुमाऊंनी पढ़ाने की पहल का किया जिक्र
कोश्यारी ने कहा कि जब वह सांसद थे, तब दिल्ली में गढ़वाली और कुमाऊंनी भाषा सिखाने के लिए पहल की गई थी, जो आज भी जारी है। उन्होंने कहा कि भाषा और संस्कृति का संरक्षण केवल सरकारी प्रयासों से नहीं, बल्कि समाज की सक्रिय भागीदारी से ही संभव है। उन्होंने कहा कि सरकार भी उत्तराखंड की संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के लिए लगातार काम कर रही है। लोक संस्कृति को मजबूत करने के साथ-साथ प्रदेश में आर्थिक, भौतिक और सांस्कृतिक विकास को आगे बढ़ाने की जरूरत है। उन्होंने रिवर्स माइग्रेशन को भी पहाड़ के भविष्य से जोड़ते हुए कहा कि गांवों को मजबूत बनाकर ही लोगों को अपनी जड़ों से जोड़ा जा सकता है।
दिवंगत कलाकारों के सम्मान की जिम्मेदारी सरकार उठाए – रौथाण
कार्यक्रम संयोजक नरेंद्र रौथाण ने कहा कि दिवंगत लोक कलाकारों के सम्मान में इस तरह के कार्यक्रम सरकार की ओर से भी आयोजित किए जाने चाहिए। उन्होंने भगत सिंह कोश्यारी से इस दिशा में पहल करने की मांग की। उन्होंने कहा कि कलाकारों को केवल बड़े मंचों तक सीमित न रखा जाए, बल्कि गांव, ब्लॉक और जिला स्तर पर भी सम्मान और पहचान मिलनी चाहिए। रौथाण ने फिल्म नीति में ब्लॉक स्तर पर कलाकारों के इंटरव्यू और चयन की व्यवस्था किए जाने की मांग भी रखी, ताकि गांवों में छिपी प्रतिभाओं को सामने आने का अवसर मिल सके।
घास काटने वाली महिला की आवाज को देश-दुनिया तक पहुंचाया
विशिष्ट अतिथि सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता संजय शर्मा दरमोड़ा ने कहा कि पितृ पक्ष में दिवंगत लोक कलाकारों को श्रद्धा सुमन अर्पित करने से बेहतर कुछ नहीं हो सकता। उन्होंने कार्यक्रम में शामिल होकर लोक कलाकारों के योगदान को सम्मान देने के लिए भगत सिंह कोश्यारी का आभार जताया। उन्होंने कहा कि ‘आवाज सुनो पहाड़ों की’ मंच ने लोक संस्कृति के साथ गांव की सामान्य महिलाओं और कलाकारों को भी मंच दिया है। घास काटने वाली महिला को मंच देकर उसकी आवाज देश-विदेश तक पहुंचाने का प्रयास लोक संस्कृति के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है।
लोक संस्कृति को राजनीतिक संरक्षण नहीं, स्थायी मंच की जरूरत – गणेश गोदियाल
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने कहा कि उत्तराखंड की लोक संस्कृति और लोक कलाकार प्रदेश की पहचान हैं। गढ़वाली, कुमाऊंनी, जौनसारी सहित स्थानीय भाषाओं और लोक परंपराओं को केवल आयोजनों तक सीमित रखने के बजाय इनके संरक्षण के लिए ठोस और स्थायी व्यवस्था जरूरी है। उन्होंने कहा कि दिवंगत कलाकारों के योगदान को याद करना सराहनीय पहल है। गांव और ब्लॉक स्तर पर कलाकारों को मंच, आर्थिक सहयोग और सम्मान देने की नीति बननी चाहिए, ताकि नई पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ी रहे।
लोक विरासत को आगे बढ़ाने में सरकार गंभीर – दीप्ति रावत भारद्वाज
भाजपा प्रदेश महामंत्री दीप्ति रावत भारद्वाज ने कहा कि उत्तराखंड की लोक संस्कृति, भाषा, गीत-संगीत और परंपराओं के संरक्षण एवं संवर्धन को लेकर सरकार गंभीरता से काम कर रही है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में सांस्कृतिक विरासत को पर्यटन और रोजगार से जोड़ने के साथ स्थानीय कलाकारों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। दिवंगत लोक कलाकारों को श्रद्धांजलि और उनके परिजनों का सम्मान समाज की सांस्कृतिक स्मृति को मजबूत करता है। ऐसे आयोजन युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों और लोक परंपराओं से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं।
लोक परंपराओं की जड़ों को बचाने पर जोर
कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि ढोल सागर, मांगल गीत और उत्तराखंड की तमाम लोक परंपराओं की जड़ें गांवों में हैं। इसलिए संस्कृति को बचाने के लिए गांवों और स्थानीय कलाकारों को केंद्र में रखना जरूरी है। मंच पर शकुंतला इष्टवाल और अनुसुईया प्रसाद उनियाल मौजूद रहे।
इन लोक कलाकारों के परिजनों का हुआ सम्मान
समारोह में दिवंगत लोक कलाकारों के परिजनों को विभिन्न विधाओं में सम्मानित किया गया। गीत-संगीत के क्षेत्र में दीवान कनवाल के पुत्र कमलेश कनवाल, गुंजन डंगवाल के पिता कैलाश डंगवाल, भगवती प्रसाद पोखरियाल की पत्नी सत्या पोखरियाल एवं पुत्र संजय पोखरियाल तथा पंडित केशव राम की पत्नी और भाई को सम्मानित किया गया। फिल्म एवं नाट्य क्षेत्र में गीता उनियाल के पति विकास उनियाल तथा जयपाल नेगी की पत्नी कोमल राणा नेगी को सम्मान मिला। भाषा-साहित्य के क्षेत्र में चारू चंद्र चंदोला की पत्नी राजेश्वरी चंदोला और हरिदत्त भट्ट ‘शैलेश’ के पुत्र हिमांशु भट्ट सम्मानित हुए। महिलाओं के विशेष योगदान के लिए कमलेश नेगी को सम्मानित किया गया। सूचना विभाग से सुरेश चंद्र भट्ट को भी सम्मान प्रदान किया गया।
कार्यक्रम का संचालन सुनील सजवाण ने किया। कार्यक्रम संयोजक नरेंद्र रौथाण ने सभी अतिथियों और प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया।
