दिनांक : 2026-09-15 00:52:00
गोपेश्वर (चमोली)। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सियासत का तापमान बढ़ने लगा है। पुराने मामले में ईडी की कार्रवाई, राहुल गांधी को ‘मियां’ कहकर संबोधित करने पर छिड़ी जुबानी जंग और दूसरी ओर उत्तराखंड क्रांति दल के भीतर चल रही खींचतान ने चुनावी माहौल को नया रंग दे दिया है। भाजपा और कांग्रेस जहां एक-दूसरे पर हमलावर हैं, वहीं उक्रांद की अंदरूनी लड़ाई तीसरी ताकत की जमीन कमजोर कर रही है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि इस पूरी लड़ाई का संदेश जनता के बीच क्या जा रहा है और चुनावी फायदा आखिर किसे मिलेगा।
पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के निजी सचिव से जुड़े पुराने मामले में ईडी की कार्रवाई को भाजपा भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई बता रही है, जबकि कांग्रेस इसे राजनीतिक कार्रवाई और बदले की सियासत के तौर पर देख रही है। यह मुद्दा आने वाले दिनों में भाजपा-कांग्रेस के बीच बड़ा चुनावी हथियार बन सकता है। भाजपा इसे कांग्रेस के पुराने शासन से जोड़कर घेर सकती है तो कांग्रेस जांच एजेंसियों के इस्तेमाल को मुद्दा बनाकर पलटवार करेगी।
इसी बीच राहुल गांधी के लिए ‘मियां’ शब्द के इस्तेमाल ने बहस को विकास और जनसमस्याओं से हटाकर बयानबाजी और पहचान की राजनीति की ओर धकेल दिया है। दोनों दलों के तीखे तेवर चुनावी माहौल को भले गरमा रहे हों, लेकिन पहाड़ का मतदाता अंततः अपने रोजमर्रा के सवालों पर भी फैसला करता है।
बेरोजगारी, पलायन, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, आपदा, भूमि कानून और खाली होते गांव आज भी उत्तराखंड की राजनीति के सबसे बड़े सवाल हैं। यदि चुनावी बहस ईडी, आरोपों और व्यक्तिगत टिप्पणियों तक सिमटती गई तो इसका उलटा असर भी हो सकता है। जनता के बीच यह सवाल उठ सकता है कि क्या राजनीतिक दल असली मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं।
इस पूरे समीकरण में उक्रांद की अंदरूनी जंग सबसे अहम कड़ी है। पहाड़ की अस्मिता और राज्य आंदोलन की विरासत वाली पार्टी यदि खुद ही बंटी रही तो भाजपा और कांग्रेस दोनों को सीट-दर-सीट फायदा मिल सकता है। जहां उक्रांद भाजपा विरोधी वोट काटेगा, वहां कांग्रेस को नुकसान होगा और जहां कांग्रेस विरोधी वोटों में सेंध लगेगी, वहां भाजपा मजबूत होगी।
यानी उक्रांद की कमजोरी का फायदा किसी एक दल को नहीं, दोनों बड़े दलों को मिल सकता है। लेकिन यदि उक्रांद समय रहते अपनी अंदरूनी खींचतान खत्म कर संगठन को एकजुट करता है तो भाजपा-कांग्रेस से नाराज मतदाताओं के सामने तीसरे विकल्प की जमीन फिर तैयार हो सकती है।
फिलहाल भाजपा के पास सत्ता और मजबूत संगठन है। कांग्रेस के पास सत्ता विरोधी माहौल को अपने पक्ष में करने का अवसर है। उक्रांद के पास पहाड़ की पुरानी राजनीतिक जमीन और आंदोलन की विरासत है। मगर 2027 का असली मुकाबला इस बात पर तय होगा कि कौन आरोपों और बयानबाजी से आगे निकलकर जनता के असली सवालों को चुनाव का केंद्रीय मुद्दा बना पाता है।
अगर भाजपा-कांग्रेस आरोपों की जंग और उक्रांद आपसी खींचतान में उलझा रहा, तो उत्तराखंड के चुनाव में सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि जनता के सामने तीसरा विकल्प कौन खड़ा करेगा?