मेरी मैत की ध्याणी, तेरू बाटू हेरदू रोलु : कैलाश को चली मां नंदा की डोली

दिनांक : 2026-09-05 17:12:00

  • बेटी की विदाई के गीतों के बीच छलकी ध्याणियों की आंखें,
  • कुरुड़ से तीन डोलियां पौराणिक यात्रा पथों पर रवाना

गोपेश्वर (चमोली)। 12 साल के लंबे इंतजार के बाद शनिवार को वह घड़ी आई, जब मां नंदा के मायके से कैलाश के लिए डोली उठी। ढोल-दमाऊं की थाप, जागरों की गूंज और जय मां नंदा के जयकारों के बीच कुरुड़ के सिद्धपीठ मंदिर से मां नंदा की बड़ी जात शुरू हुई। डोली के आगे बढ़ते ही श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं। खासकर ध्याणियां मां नंदा को बेटी मानकर उनकी विदाई के समय अपने आंसू नहीं रोक सकीं। किसी ने हाथ जोड़कर मां से परिवार की खुशहाली मांगी तो किसी ने बेटी की तरह उन्हें विदा करते हुए भावुक होकर मंगल गीत गाए।

सिद्धपीठ कुरुड़ से मां राजराजेश्वरी बधाण की नंदा डोली, कुरुड़-दशोली की नंदा डोली और बंड क्षेत्र की नंदा डोली अपने-अपने पौराणिक यात्रा मार्गों से हिमालय की ओर रवाना हुईं। डोलियों के साथ बड़ी संख्या में श्रद्धालु भी यात्रा पर निकले। नंदा की बड़ी जात के शुरू होते ही सीमांत जनपद चमोली एक बार फिर मां नंदा की भक्ति में डूब गया है।

मां नंदा को पहाड़ में बेटी का स्वरूप माना जाता है। गांव उनका मायका और कैलाश उनका ससुराल। इसलिए नंदा की डोली की विदाई यहां महज धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि बेटी को मायके से विदा करने की सदियों पुरानी भावनात्मक परंपरा है। यही वजह रही कि डोली के प्रस्थान के समय पूरा वातावरण श्रद्धा के साथ विरह में डूब गया।

जागर और लोकगीतों ने बांधा समां

कुरुड़ मंदिर परिसर में मां नंदा के पौराणिक जागर और लोकगीत गूंजते रहे। ढोल-दमाऊं की थाप के साथ दांकुड़ी, झोड़ा और चांचरी की मधुर लहरियों ने पूरे वातावरण को अलौकिक बना दिया। डोली की एक झलक पाने और मां नंदा का आशीर्वाद लेने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचे। नंदा की बड़ी जात के साथ पहाड़ की लोक संस्कृति भी जीवंत हो उठी है। गांवों से लेकर डांडी-कांठी तक जागरों की गूंज सुनाई दे रही है। बुजुर्गों के साथ युवा और बच्चे भी यात्रा में शामिल होकर सदियों पुरानी परंपरा के साक्षी बन रहे हैं।

एक बेटी की विदाई, पूरे पहाड़ की आंखें नम

मां नंदा की विदाई का सबसे भावुक पक्ष ध्याणियों का है। जिस तरह पहाड़ की बेटी शादी के बाद अपने मायके से विदा होती है, उसी भाव के साथ नंदा को भी कैलाश के लिए विदा किया जाता है। डोली आगे बढ़ती है और पीछे मायके की आंखों में आंसू रह जाते हैं। ‘मेरी मैत की ध्याणी, तेरू बाटू हेरदू रोलु३’ जैसे पारंपरिक गीतों में बेटी के लौटकर आने की आस और विदाई का दर्द एक साथ महसूस होता है। डोली के साथ चल रहे श्रद्धालुओं के चेहरे पर आस्था थी, जबकि पीछे छूट रहे लोगों की आंखों में विरह।

295 किमी की यात्रा, होमकुंड में होगा पड़ाव

मां नंदा की बड़ी जात करीब 295 किलोमीटर लंबे पौराणिक यात्रा मार्ग से होकर हिमालय की ओर बढ़ेगी। यात्रा के दौरान विभिन्न पड़ावों पर पूजा-अर्चना और पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान होंगे। 20 सितंबर को होमकुंड पहुंचने के बाद चैसिंग्या खाडू को कैलाश की ओर विदा किया जाएगा। इसके बाद वापसी यात्रा शुरू होगी और 30 सितंबर को कुरुड़ पहुंचने के साथ बड़ी जात का समापन होगा।

लोक आस्था का सबसे बड़ा संगम

12 वर्ष के अंतराल में आयोजित होने वाली मां नंदा की बड़ी जात उत्तराखंड की लोक आस्था और संस्कृति का अनूठा पर्व है। इस यात्रा में धर्म के साथ पहाड़ की सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराएं भी जुड़ी हैं। नंदा के मायके से लेकर हिमालय तक हर पड़ाव पर लोगों की भावनाएं मां नंदा से जुड़ी रहती हैं।

डोली अब कैलाश की ओर बढ़ चली है। पीछे रह गया है मायका, ध्याणियों की नम आंखें और एक ही उम्मीदकृबेटी नंदा फिर लौटेंगी। 12 साल बाद शुरू हुई इस यात्रा ने एक बार फिर साबित कर दिया कि पहाड़ के लिए मां नंदा सिर्फ आराध्य देवी नहीं, बल्कि हर घर की बेटी हैं।

 

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