दिनांक : 2026-03-29 20:01:00
ज्योतिर्मठ : धर्मनगरी ज्योतिर्मठ के ऐतिहासिक गांधी मैदान में ‘नरसिंह नवदुर्गा सेवा समिति’ के तत्वाधान में आयोजित भव्य रामलीला के आठवें दिन ‘अंगद-रावण संवाद’ का मंचन किया गया। इस दौरान कलाकारों के सजीव अभिनय और ओजपूर्ण संवादों ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। प्रभु श्री राम के दूत बनकर रावण की सभा में पहुँचे युवराज अंगद और अहंकारी लंकेश के बीच हुए नीतिगत युद्ध ने पांडाल में मौजूद हर दर्शक को दांतों तले उंगली दबाने पर मजबूर कर दिया।
धर्म और अधर्म का वैचारिक द्वंद्व
लीला के दौरान युवराज अंगद ने अत्यंत शालीनता और बुद्धिमत्ता से रावण को समझाने का प्रयास किया। उन्होंने धर्म-नीति की दुहाई देते हुए कहा कि वह जगत जननी माता सीता को ससम्मान प्रभु श्री राम के चरणों में समर्पित कर दें और विनाशकारी युद्ध को टाल दें। हालांकि, अपने बल के मद में चूर दशानन ने अंगद के प्रस्ताव को ठुकराते हुए उनकी मर्यादा का उपहास किया। जब रावण पर समझाने का कोई असर नहीं हुआ, तब अंगद ने अपनी वीरता और प्रभु भक्ति का परिचय देते हुए रावण के दरबार के बीचों-बीच अपना पैर जमा दिया।
अंगद का पैर और रावण की चुनौती
अंगद ने भारी सभा में चुनौती दी कि यदि कोई भी राक्षस उनके पैर को तिल भर भी हिला दे, तो वे अपनी हार स्वीकार कर लेंगे और श्री राम दल वापस लौट जाएगा। रावण के एक-से-एक बलशाली योद्धाओं ने पूरी शक्ति लगा दी, लेकिन वे अंगद के पैर को हिलाना तो दूर, टस से मस भी नहीं कर सके। इस दृश्य के दौरान गांधी मैदान दर्शकों की तालियों और ‘जय श्री राम’ के जयकारों से गुंजायमान हो उठा। अंत में स्वयं रावण जब अंगद का पैर पकड़ने उठा, तब अंगद ने उसे धिक्कारते हुए प्रभु के चरणों में शरण लेने की सीख