दिनांक : 2026-03-24 20:06:00
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक अहम फैसले में सेना, नौसेना और वायुसेना की उन महिला शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) अधिकारियों को बड़ी राहत दी है, जिन्हें परमानेंट कमीशन (PC) नहीं दिया गया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसी सभी महिला अधिकारी अब पूर्ण पेंशन लाभ की हकदार होंगी। यह फैसला मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने सुनाया।
भेदभावपूर्ण व्यवस्था पर कोर्ट की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि महिला अधिकारियों को परमानेंट कमीशन से वंचित रखना केवल व्यक्तिगत मूल्यांकन का मामला नहीं था, बल्कि यह एक ऐसी प्रणालीगत व्यवस्था का परिणाम था, जिसमें उनके साथ भेदभाव हुआ। कोर्ट ने माना कि महिलाओं के प्रदर्शन का आकलन पुरुष अधिकारियों की तुलना में निष्पक्ष और गहराई से नहीं किया गया, जिससे उनके करियर और योग्यता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।
अनुच्छेद 142 के तहत राहत
पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपने विशेष अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए कहा कि न्याय सुनिश्चित करने के लिए यह राहत देना आवश्यक है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि 2019, 2020 और 2021 में जिन महिला अधिकारियों को पहले ही परमानेंट कमीशन दिया जा चुका है, उनकी स्थिति में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा।
20 वर्ष की सेवा मानकर मिलेगा पेंशन
अदालत ने कहा कि 2019, 2020 और 2021 के बोर्ड में परमानेंट कमीशन के लिए विचार की गई सभी महिला SSC अधिकारियों को 20 वर्ष की सेवा पूरी करने वाला माना जाएगा। इसी आधार पर उन्हें पेंशन और अन्य सभी लाभ दिए जाएंगे, हालांकि उन्हें पिछले वेतन का बकाया नहीं मिलेगा। यह आदेश 1 नवंबर 2025 से प्रभावी होगा।
नीतियों पर उठाए सवाल
कोर्ट ने वायुसेना के मामले में 2019 में लागू “सर्विस लेंथ” और “मिनिमम परफॉर्मेंस” मानकों को जल्दबाजी में लागू किया गया बताया, जिससे अधिकारियों को उन्हें पूरा करने का उचित अवसर नहीं मिला।
ACR और पदस्थापन में भी असमानता
पीठ ने यह भी कहा कि महिला अधिकारियों की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (ACR) उस समय तैयार की गईं, जब उन्हें परमानेंट कमीशन के लिए अयोग्य माना जाता था। इससे उनके मूल्यांकन पर नकारात्मक असर पड़ा। साथ ही, उन्हें महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्ति के समान अवसर नहीं मिले, जिससे उनकी मेरिट प्रभावित हुई।
याचिका के आधार पर आया फैसला
यह फैसला विंग कमांडर सुचेता ईडन समेत अन्य अधिकारियों द्वारा दायर याचिकाओं पर आया, जिसमें 2019 की नीतियों और सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (AFT) के फैसलों को चुनौती दी गई थी।